नई दिल्ली। आज बांटी गई ये किताबें सिर्फ़ काग़ज़ के पन्ने नहीं थीं, बल्कि उन सपनों की शुरुआत थीं जो अक्सर गरीबी की दीवारों के पीछे दबकर रह जाते हैं। समाजसेवी Sunny भाई ने आज बिना किसी मंच, भाषण या दिखावे के जरूरतमंद बच्चों के हाथों में किताबें थमाईं और शिक्षा के प्रति एक सशक्त संदेश दिया।
इस पहल के दौरान न कोई कैमरे के लिए रिहर्सल थी और न ही कोई औपचारिक कार्यक्रम। मौजूद थे तो बस मासूम चेहरे, जिज्ञासा से भरी आंखें और सीखने की तीव्र चाह। Sunny भाई ने यह साबित किया कि सच्ची समाज सेवा शोर से नहीं, संवेदना से होती है।
अक्सर कहा जाता है कि “बच्चे देश का भविष्य हैं”, लेकिन भविष्य तभी संवरता है जब वर्तमान में कोई जिम्मेदारी उठाए। Sunny भाई ने वही किया—बिना प्रचार, बिना अपेक्षा। इन बच्चों के लिए एक किताब का मतलब सिर्फ़ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक नई दुनिया, नई सोच और गरीबी के दायरे से बाहर निकलने की पहली सीढ़ी है।
जहाँ आज के समय में कई लोग दान को सोशल मीडिया कंटेंट बना लेते हैं, वहीं Sunny भाई ने कंटेंट को ज़िम्मेदारी में बदल दिया। आज अगर किसी बच्चे के चेहरे पर किताब पकड़कर मुस्कान आई है, तो समझिए किसी शिक्षक का सपना जिंदा हुआ है और किसी माता-पिता की उम्मीद को नई ताक़त मिली है।
यह पहल केवल किताबें बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश है—अगर आप एक बच्चे के जीवन में शिक्षा की रोशनी जला सकते हैं, तो वही सबसे बड़ी समाज सेवा है।
Sunny भाई को सलाम है, उस सोच को सलाम है जो समाज को आगे बढ़ाती है। अगर हर इंसान एक बच्चे की शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले ले, तो शायद किसी बच्चे को यह नहीं कहना पड़ेगा—
“काश मुझे भी पढ़ने का मौका मिलता…”
शिक्षा दान नहीं, अधिकार है।
और जो अधिकार दिलाए, वही असली हीरो होते हैं।


