Wednesday, February 4, 2026
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SIFFCY के उद्घाटन पर सुगम्यता और समावेशन पर जोर, सिनेमा को बताया सामाजिक बदलाव का माध्यम

दिल्ली(जीतेन्द्र शर्मा):स्माइल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रन एंड यूथ (SIFFCY) के 12वें संस्करण के उद्घाटन अवसर पर समावेशन और सुगम्यता को लेकर गंभीर विमर्श देखने को मिला। पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) की अपर सचिव सुश्री मनमीत कौर नंदा, IAS ने कहा कि समावेशन किसी पर उपकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। उन्होंने कहा कि इसे केवल नीतियों या बुनियादी ढांचे तक सीमित न रखकर सोच और व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है।

अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। इनमें लगभग 80 लाख दिव्यांग बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें शिक्षा, सार्वजनिक स्थलों और सिनेमा हॉल जैसी मूलभूत सुविधाओं तक आज भी पूरी पहुंच नहीं मिल पाती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले विकाश कुमार बनाम यूपीएससी का हवाला देते हुए कहा कि ‘उचित समायोजन’ संवैधानिक दायित्व है और इससे इनकार करना भेदभाव की श्रेणी में आता है।

स्माइल फाउंडेशन के को-फाउंडर और SIFFCY के चेयरमैन शांतनु मिश्रा ने कहा कि बचपन वह दौर होता है, जब मूल्यों और सोच की नींव पड़ती है। सिनेमा बच्चों और युवाओं में संवेदनशीलता, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। वहीं, फेस्टिवल डायरेक्टर और CIFEJ 2025-27 के अध्यक्ष जितेंद्र मिश्रा ने SIFFCY को एक ऐसा मंच बताया, जो विभिन्न देशों और संस्कृतियों की कहानियों को एक साथ लाकर युवाओं को वैश्विक दृष्टिकोण से जोड़ता है।
सुश्री नंदा ने प्रशासनिक अनुभव साझा करते हुए कहा कि केवल सरकारी आदेशों से वास्तविक समावेशन संभव नहीं है। कई बार सुविधाएं मौजूद होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो पाता, जो सोच में बदलाव की कमी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि सिनेमा लोगों के दिलों तक पहुंचता है और जब बच्चे फिल्मों में दिव्यांग पात्रों को सामान्य जीवन जीते हुए देखते हैं, तो समाज में समावेशन की भावना मजबूत होती है।

उल्लेखनीय है कि SIFFCY का 12वां संस्करण 28 जनवरी से 3 फरवरी 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। यह फेस्टिवल स्माइल फाउंडेशन की पहल है और इसे दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारत में यूरोपीय संघ के डेलीगेशन के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। हाइब्रिड फॉर्मेट में हो रहे इस आयोजन में देशभर के 100 से अधिक स्कूलों और कम्युनिटी स्पेस में आउटरीच स्क्रीनिंग के साथ-साथ ऑनलाइन मंच पर भी फिल्में प्रदर्शित की जा रही हैं।

नॉन-प्रॉफिट और बिना टिकट वाले इस फेस्टिवल में 35 से अधिक देशों की 150 से ज्यादा फिल्में दिखाई जा रही हैं। साथ ही ECFA, CIFEJ और FCCI जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड भी प्रदान किए जाएंगे। फेस्टिवल की शुरुआत पोलिश-चेक फिल्म ‘ग्रैंडपा लेट्स गो!’ से हुई है, जबकि इस वर्ष का फोकस देश नीदरलैंड्स है।

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