Tuesday, May 5, 2026
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ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली में पत्रकार शहजाद अहमद की नज़्म ने बांधा समां

ईरान कल्चर हाउस, दिल्ली में विशेष इस्लामी गणतंत्र ईरान के सर्वोच्च नेता शहीद अली खमेनेई साहब को याद किया गया बड़ी संख्या में लोगों ने लिया हिस्सा, विचारों और मूल्यों को किया याद

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली स्थित ईरान कल्चर हाउस में एक विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य इस्लामी गणतंत्र ईरान के सर्वोच्च नेता शहीद अली खमेनेई के विचारों, उनके नेतृत्व और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को याद करना और उन पर चर्चा करना था।

सभा के दौरान उपस्थित लोगों ने एकजुट होकर शांति, न्याय, इंसाफ और मानवता जैसे मूल्यों को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। कार्यक्रम में एक भावनात्मक माहौल देखने को मिला, जहां वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए वैश्विक स्तर पर शांति और भाईचारे की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस अवसर पर भारत में इस्लामी गणतंत्र ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल माजिद हकीम इलाही विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने कार्यक्रम में आए लोगों से मुलाकात की और उनकी भावनाओं एवं विचारों को सुना। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि इंसानियत, सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलना ही किसी भी समाज की वास्तविक ताकत है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध बहुत पुराने और मजबूत हैं, जिन्हें ऐसे आयोजनों के माध्यम से और मजबूती मिलती है।

पत्रकार शहजाद अहमद की नज़्म ने बांधा समां
कार्यक्रम की विशेष आकर्षण दिल्ली के पत्रकार शहजाद अहमद की प्रस्तुति रही। उन्होंने एक प्रभावशाली और भावनात्मक नज़्म पेश की, जिसमें साहस, सच्चाई और अहल-ए-बैत की शिक्षाओं को खूबसूरती से पिरोया गया था। उनकी नज़्म ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया और माहौल को और भी गहन बना दिया।

उन्होंने अपनी नज़्म में कहा—
ना झुके थे, ना झुकेंगे — सीना तान कर जीना उनका अंदाज़ था,
हक़ की राहों पर चलना ही उनका असली ईमान था।

ना हार का डर, ना दुश्मनी से कभी घबराए,
डटकर खड़े रहे, ज़ुल्म के सामने सिर कभी ना झुकाए।

यह वो क़ौम है जो अहल-ए-बैत का परचम उठाए हुए है,
ईमान और सच्चाई के लिए जो सदियों से सर कटाए हुए है।

वो मौला अली वाले थे, सैयद अयातुल्लाह अली खेमनाई साहब — जिनका सिर सिर्फ सजदे में झुका,दुश्मनों के आगे नहीं।

शहीद होकर भी दुनिया को पैग़ाम दे गए,
“अली वाले हैं हम — सर कट सकता है, झुकेगा नहीं,” कह गए।

इस नज़्म को सुनकर उपस्थित लोगों ने जोरदार तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया।

डॉ. अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने शहजाद अहमद की प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह की रचनाएं समाज में सकारात्मक ऊर्जा और जागरूकता फैलाने का काम करती हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य और कला के माध्यम से दिए गए संदेश लोगों के दिलों तक सीधे पहुंचते हैं और लंबे समय तक प्रभाव छोड़ते हैं।

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