नई दिल्ली – द्वारका स्थित यशोभूमि कन्वेंशन सेंटर आज पेपर उद्योग के दुनिया के सबसे बड़े समागम पेपरेक्स 2025 के 17वें संस्करण की शुरुआत का साक्षी बना। इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया द्वारा आयोजित इस मेगा इवेंट में 28 देशों के 675 प्रदर्शकों और 33,000 से अधिक व्यापारिक आगंतुकों की उपस्थिति ने भारतीय पेपर उद्योग की वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया।
चार दिवसीय यह भव्य आयोजन इंडियन एग्रो एंड रीसाइकिल्ड पेपर मिल्स एसोसिएशन के सहयोग और वर्ल्ड पेपर फोरम के समर्थन से आयोजित किया गया है, जिसका उद्देश्य है—टिकाऊ, टेक्नोलॉजी-ड्रिवन और संसाधन-कुशल पेपर उद्योग का भविष्य तैयार करना।
उद्घाटन समारोह में इंडियन पल्प एंड पेपर टेक्निकल एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन खैतान, केंद्रीय राज्य मंत्री (बिजली एवं नवीन-नवीकरणीय ऊर्जा) श्रीपाद येसो नाइक (वर्चुअल), इंडियन पेपर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन अग्रवाल, और इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुदरास सहित कई उद्योग-विशेषज्ञ मौजूद रहे।
केंद्रीय मंत्री श्रीपाद नाइक ने अपने संबोधन में कहा कि पेपरएक्स भारतीय कागज़ उद्योग की क्षमता और उसकी वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका का दर्पण है। उन्होंने बताया कि भारत का पेपर उद्योग 7–8% वार्षिक वृद्धि दर से आगे बढ़ रहा है और 2030 तक उत्पादन क्षमता 24 मिलियन टन से बढ़कर 32 मिलियन टन होने की उम्मीद है।उन्होंने ऊर्जा दक्षता, रीसाइक्लिंग, डिजिटलीकरण और कार्बन-न्यूट्रल रणनीतियों को भारत के “विकसित भारत 2047” लक्ष्य के लिए अहम बताया।
इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुदरास ने कहा कि भारत का पेपर एवं पैकेजिंग सेक्टर 68% रीसाइक्लिंग दर के साथ असाधारण सर्कुलरिटी प्रदर्शित करता है।
उन्होंने बताया कि:
2024–25 में भारत का पेपर उपभोग 23.5 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत का प्रति व्यक्ति उपभोग सिर्फ 15 किलोग्राम है—जो वैश्विक औसत 57 किलोग्राम से बहुत कम है।
2028 तक यह बाजार 16.64 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
इंडियन पेपर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन अग्रवाल ने बताया कि उद्योग अपने वुड-पल्प मिश्रण में अब 25% से 50% तक बांस का उपयोग कर रहा है।
यह बदलाव केंद्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों से बांस परिवहन को नियंत्रण-मुक्त किए जाने के कारण सम्भव हुआ है।इससे न केवल मिलों की कच्चे माल की आपूर्ति मजबूत हुई है, बल्कि स्थानीय किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को भी बड़ा लाभ मिला है।
इंडियन एग्रो एंड रीसाइकिल्ड पेपर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद अग्रवाल ने कहा कि देश में लगभग 800 पेपर मिलें हैं, जिनमें से 200 वर्तमान में नीति-संबंधी चुनौतियों के कारण बंद हैं।
फाइबर की कमी के चलते उद्योग को कृषि अवशेषों—
गेहूं का पुआल, चावल का पुआल, सरकंडा, खोई—पर निर्भर होना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि:भारत में घरेलू पुराने कागज़ का संग्रह सिर्फ 50% है, जबकि विकसित देशों में यह 90% तक है।
इस अंतर को पूरा करने के लिए भारत को हर साल 10 मिलियन टन पुराने कागज़ का आयात करना पड़ता है।
पेपरेक्स 2025 में जेके पेपर, टीएनपीएल, ट्राइडेंट ग्रुप, बीआईएलटी ग्राफिक पेपर, आंध्रा पेपर, ओरिएंट पेपर, वेस्ट कोस्ट पेपर जैसी अग्रणी कंपनियों ने भाग लिया और ऊर्जा-कुशल, पर्यावरण-सुरक्षित और डिजिटल उत्पादन तकनीकों का प्रदर्शन किया।


