Monday, March 16, 2026
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दिल्ली की महिलाओं में बढ़ रहा अकेलापन और मानसिक तनाव, एमपावर रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

नई दिल्ली, राजधानी दिल्ली में महिलाओं के बीच बढ़ती उम्र के साथ अकेलापन और मानसिक तनाव की समस्या तेजी से बढ़ रही है। एमपावर की एक नई रिपोर्ट में यह सामने आया है कि खासकर युवा और कामकाजी आयु वर्ग की महिलाएं भावनात्मक तनाव और अकेलेपन जैसी चुनौतियों से जूझ रही हैं।

यह रिपोर्ट आदित्य बिर्ला एजुकेशन ट्रस्ट की पहल एमपावर द्वारा जारी की गई है, जिसकी स्थापना संस्थापिका और चेयरपर्सन नीरजा बिर्ला ने की है। रिपोर्ट के लिए अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच दिल्ली की 98,340 महिलाओं से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिन्होंने काउंसलिंग सेवाओं, हेल्पलाइन, मेंटल हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी आउटरीच कार्यक्रमों के माध्यम से सहायता ली।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में 18 से 25 वर्ष की 24,573 युवतियां अक्सर अनसुलझे भावनात्मक दर्द, दोस्ती में टकराव और व्यक्तिगत सीमाओं को लेकर भ्रम जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। इस आयु वर्ग की कई महिलाएं रिश्तों को संभालने में कठिनाई, पहचान से जुड़ी उलझनों और पढ़ाई तथा शुरुआती करियर के दबाव का सामना कर रही हैं।

वहीं 26 से 49 वर्ष की 33,726 महिलाओं ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का सहारा लिया। यह वह आयु वर्ग है जिसमें महिलाएं अपने करियर, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। इसके बावजूद इस वर्ग की कई महिलाओं ने **अकेलापन, रिश्तों से जुड़ा तनाव और भावनात्मक थकावट** महसूस करने की बात कही।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ रही है। परामर्श और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से 18 वर्ष से कम आयु की 37,858 लड़कियों तक पहुंच बनाई गई, जो दर्शाता है कि परिवार, शिक्षक और समुदाय अब किशोरावस्था में भावनात्मक स्वास्थ्य को अधिक महत्व देने लगे हैं।

इसके अलावा 50 वर्ष से अधिक आयु की 2,183 महिलाओं ने भी सहायता ली। इस उम्र में उनकी प्रमुख समस्याएं **अकेलापन, पारिवारिक बदलाव और भावनात्मक सहारे की कमी से जुड़ी रहीं।

आदित्य बिर्ला एजुकेशन ट्रस्ट और एमपावर की संस्थापिका नीरजा बिर्ला ने कहा,
“महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित नहीं होता, बल्कि कार्यस्थल, परिवार और समाज की परिस्थितियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां महिलाएं बिना किसी दबाव के अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे सकें और मदद मांगने में संकोच न करें।”

वहीं एमपावर – द सेंटर दिल्ली की प्रमुख और मनोचिकित्सक डॉ. प्रीति पारख के अनुसार,
“दिल्ली की महिलाओं में जो पैटर्न सामने आए हैं, वे बताते हैं कि जीवन के अलग-अलग चरणों में भावनात्मक जरूरतें भी बदलती हैं। युवा महिलाएं पहचान और रिश्तों को लेकर संघर्ष करती हैं, जबकि 30 और 40 की उम्र की महिलाएं सक्रिय जीवन के बावजूद भावनात्मक थकान और अकेलेपन का अनुभव करती हैं।”

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए समाज में मजबूत सहायता तंत्र की आवश्यकता है। काउंसलिंग सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना, मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना, शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम चलाना और कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए बेहतर समर्थन व्यवस्था तैयार करना बेहद जरूरी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि परिवार, समाज और कार्यस्थल मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें जहां भावनात्मक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा हो, तो महिलाओं को समय रहते मदद मिल सकती है और वे मानसिक रूप से अधिक सशक्त बन सकती हैं।

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