नीट पेपर लीक: आखिर जिम्मेदार कौन
देश में लाखों छात्र-छात्राएं वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं। उनके माता-पिता अपनी जमा-पूंजी खर्च करते हैं, सपनों को संजोते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनका बच्चा अपनी योग्यता के बल पर डॉक्टर बनेगा। लेकिन जब देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक NEET का प्रश्नपत्र लीक होने की खबर सामने आती है, तो केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता ही नहीं टूटती, बल्कि करोड़ों लोगों का व्यवस्था पर विश्वास भी डगमगा जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या केवल कुछ छोटे-मोटे आरोपियों की गिरफ्तारी से मामला खत्म हो जाएगा? जिन लाखों विद्यार्थियों ने ईमानदारी से तैयारी की, उनके मानसिक तनाव, उनकी मेहनत और उनके भविष्य के साथ हुए खिलवाड़ की भरपाई कौन करेगा?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। यहां की संस्थाओं पर लोगों का भरोसा ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन जब बार-बार भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह परीक्षा जैसी बुनियादी प्रक्रिया की गोपनीयता भी सुनिश्चित नहीं कर सकती?
यह केवल तकनीकी या प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि नैतिक जवाबदेही का भी प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी विभाग के अंतर्गत इतनी बड़ी चूक होती है, तो नैतिक जिम्मेदारी तय की जाती है। इसी संदर्भ में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि इतनी बड़ी घटना के बाद नैतिक आधार पर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए था, ताकि जवाबदेही का एक स्पष्ट संदेश देश के सामने जाता।
हालांकि इस्तीफा देना या न देना राजनीतिक निर्णय का विषय हो सकता है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सरकार और संबंधित एजेंसियां ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाती हैं। केवल जांच समितियां बनाना और बयान देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है ऐसी व्यवस्था विकसित करने की, जिसमें परीक्षा माफियाओं के लिए कोई जगह न बचे और विद्यार्थियों का भरोसा दोबारा कायम हो सके।
देश के युवाओं का भविष्य किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि उनकी मेहनत और प्रतिभा पर प्रश्नचिह्न लगने लगें, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का संकट बन जाता है। इसलिए अब समय आ गया है कि जवाबदेही तय हो, दोषियों को कठोर सजा मिले और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी छात्र को अपनी मेहनत के साथ हुए अन्याय का सामना न करना पड़े।
क्योंकि सवाल केवल एक परीक्षा का नहीं है, सवाल देश के करोड़ों युवाओं के सपनों का है
जितेंद्र शर्मा लेखक सामाजिक विचारक व पत्रकार हैं


