नई दिल्ली। देश की अदालतों में लंबित करीब 5 करोड़ मामलों के बीच न्यायिक सुधार को लेकर बहस तेज हो गई है। जजों की नियुक्ति, बुनियादी ढांचे के विस्तार और डिजिटलीकरण के बावजूद मामलों का अंबार कम नहीं हो रहा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है—जहां झूठी शिकायत, फर्जी हलफनामा और शपथ लेकर झूठ बोलने पर त्वरित व कठोर कार्रवाई का अभाव है।
इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘सतयुग बिल’ की मांग उठाई गई। वक्ताओं ने कहा कि जब तक झूठी गवाही और फर्जी दस्तावेजों पर सख्ती नहीं होगी, तब तक लंबित मामलों में कमी संभव नहीं है।
13 फरवरी 2026 को लोकसभा में भी यह मुद्दा गूंजा, जहां झूठी गवाही को लंबित मामलों का बड़ा कारण बताया गया। बीएनएसएस की धारा 215 (पूर्व में सीआरपीसी 195) के तहत कार्रवाई की जटिल प्रक्रिया को सजा में बाधा माना गया। इसके बाद 26 फरवरी 2026 को Supreme Court of India ने जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में अनिवार्य सत्य प्रतिज्ञा, अदालत परिसरों में दंड संबंधी जानकारी का प्रदर्शन और मौजूदा कानूनों के कड़ाई से पालन की मांग की गई है। अगली सुनवाई अप्रैल में प्रस्तावित है।
प्रेस वार्ता में टीम सतयुग के राघव गर्ग ने पांच प्रमुख सुधार सुझाए—कार्रवाई की प्रक्रिया सरल करना, ‘न्याय में बाधा’ से जुड़े मामलों का तिमाही डेटा सार्वजनिक करना, झूठी गवाही के मामलों को फास्ट-ट्रैक करना और प्ली बार्गेनिंग की दर बढ़ाना। उन्होंने कहा कि भारत में प्ली बार्गेनिंग की दर 0.11 प्रतिशत है, जबकि कई विकसित देशों में यह 90 प्रतिशत से अधिक है।
याचिकाकर्ता व अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि जब तक बीएनएस और बीएनएसएस में संशोधन नहीं होगा, तब तक व्यवस्था में ठोस बदलाव संभव नहीं है। प्रस्तावित ‘सतयुग बिल’ का मकसद शपथ की पवित्रता बहाल करना और न्याय प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह बनाना बताया जा रहा है। अब नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है।


