नई दिल्ली। भारत की अग्रणी ट्रस्ट एवं ऑथेन्टिकेशन टेक्नोलॉजी कंपनी AuthBridge ने अपनी अर्द्ध-वार्षिक रिपोर्ट ‘वर्कफोर्स फ्रॉड फाइल्स – H1 FY26’ जारी की है। रिपोर्ट में देशभर में बैकग्राउंड वैरिफिकेशन से जुड़े रुझानों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें पारंपरिक व्हाइट-कॉलर और ऑन-डिमांड (गिग) वर्कफोर्स की हायरिंग में उल्लेखनीय विसंगतियां सामने आई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2026 की पहली छमाही में व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों की भर्ती में 4.33 फीसदी विसंगतियां दर्ज की गईं, जबकि ऑन-डिमांड इकोसिस्टम (ODE) में यह आंकड़ा 5.61 फीसदी रहा। यह दर्शाता है कि भर्ती प्रक्रिया के तेजी से डिजिटल होने के बावजूद बुनियादी सत्यापन में खामियां बनी हुई हैं।
व्हाइट-कॉलर भूमिकाओं में सबसे अधिक 11.15 फीसदी विसंगतियां एम्प्लॉयमेंट वैरिफिकेशन में पाई गईं। इसके अलावा: पते की जांच: 7.68%
शिक्षा सत्यापन: 4.49%
रेफरेंस चेक: 4.17%
ड्रग स्क्रीनिंग: 1.87%
क्रिमिनल रिकॉर्ड चेक: 0.50%
गिग और फ्लेक्सिबल रोल्स में पते की जांच में 9.70 फीसदी, पहचान सत्यापन में 2.53 फीसदी और क्रिमिनल रिकॉर्ड जांच में 2.23 फीसदी विसंगतियां दर्ज की गईं। यह ग्राहक-केन्द्रित और फील्ड ऑपरेशन्स से जुड़े पदों में सख्त सत्यापन की आवश्यकता को दर्शाता है।
उद्योगों के अनुसार टेलीकॉम सेक्टर में सबसे अधिक 15.42 फीसदी विसंगतियां सामने आईं। इसके बाद:
आईटी: 12.02%
फार्मा: 11.21%
रिटेल: 10.64%
बैंकिंग एवं बीएफएसआई: 10.23%
एम्प्लॉयमेंट वैरिफिकेशन में रिटेल (16.37%) और टेलीकॉम (14.32%) सेक्टर में सर्वाधिक गड़बड़ियां दर्ज की गईं।
Ajay Trehan, सीईओ एवं संस्थापक, AuthBridge ने कहा कि हायरिंग में विसंगतियां संगठनों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि बैकग्राउंड वैरिफिकेशन को केवल औपचारिकता न मानकर निरंतर प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भर्ती की प्रारंभिक अवस्था में ही जांच शुरू की जाए और समय-समय पर ड्रग टेस्टिंग, कोर्ट रिकॉर्ड जांच तथा लाइफस्टाइल रिस्क असेसमेंट जैसे कदम उठाए जाएं।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि डिजिटल युग में तेज भर्ती प्रक्रियाओं के साथ-साथ सटीक और संरचित बैकग्राउंड वैरिफिकेशन अनिवार्य है। संगठनों के लिए भरोसेमंद और अनुपालन-आधारित कार्यबल तैयार करने हेतु मजबूत ट्रस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।


