Saturday, September 5, 2026
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नई दिल्ली में हुई फिल्म ‘खेजड़ी’ की खास स्क्रीनिंग,पहचान, भेदभाव और सामाजिक स्वीकार्यता के सवालों से रूबरू कराती है फिल्म; आशीष शर्मा के दमदार अभिनय की जमकर सराहना

नई दिल्ली,राजस्थानी सिनेमा की एक संवेदनशील और चर्चित फिल्म ‘खेजड़ी’ की विशेष स्क्रीनिंग शुक्रवार को नई दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित BMVK ऑडिटोरियम में आयोजित की गई। भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियों और भाषाओं पर आधारित मनोरंजन को बढ़ावा देने वाले प्लेटफॉर्म स्टेज की ओर से आयोजित इस विशेष स्क्रीनिंग में फिल्म की कहानी, कलाकारों के अभिनय और सामाजिक संदेश ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।

फिल्म के अंतिम दृश्य के बाद कुछ देर तक ऑडिटोरियम में खामोशी छाई रही। स्क्रीन पर चल रहे क्रेडिट के दौरान दर्शक भावुक नजर आए। फिल्म की कहानी ने पहचान, सामाजिक पूर्वाग्रह, भेदभाव, सम्मान और स्वीकार्यता जैसे गंभीर सवालों को इस तरह सामने रखा कि स्क्रीनिंग समाप्त होने के बाद भी दर्शक उसके प्रभाव से बाहर नहीं निकल सके।

कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता विनीत कुमार, जिन्हें शूल, मसान, महारानी और भोला जैसी फिल्मों एवं परियोजनाओं में उनके अभिनय के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से मौजूद रहे। उनके साथ स्टेज के सह-संस्थापक एवं सीईओ विनय सिंघल, सह-संस्थापक परवीन सिंघल और शशांक वैष्णव सहित फिल्म से जुड़े कलाकार एवं रचनात्मक टीम के सदस्य उपस्थित रहे।

स्क्रीनिंग में बसेरा सामाजिक संस्थान की रामकली भी ट्रांसजेंडर समुदाय के कई सदस्यों के साथ शामिल हुईं। उनके लिए ‘खेजड़ी’ की कहानी केवल पर्दे पर दिखाई जा रही एक फिल्म नहीं थी, बल्कि पहचान, सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता से जुड़े उन अनुभवों को सामने रखने वाली कहानी थी, जिनसे समुदाय के कई लोग वास्तविक जीवन में गुजरते हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्य के बाद रामकली समेत कई दर्शक भावुक दिखाई दिए। इस दौरान ऑडिटोरियम में मौजूद लोगों के बीच फिल्म के विषय और उसके सामाजिक प्रभाव को लेकर गंभीर चर्चा भी हुई।

‘खेजड़ी’ की यही विशेषता रही कि उसने अपने विषय को केवल भावनात्मक कहानी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि समाज किसी व्यक्ति की पहचान को किस नजरिए से देखता है और सामाजिक पूर्वाग्रह किस तरह किसी इंसान के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।

फिल्म की कहानी किरण सिंह की लघुकथा ‘सांझा’ से प्रेरित है। कहानी एक ऐसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे उसका पिता समाज के पूर्वाग्रह और संभावित भेदभाव से बचाने के लिए दुनिया से छिपाकर रखता है।

लेकिन एक समय ऐसा आता है जब उसकी वास्तविक पहचान सामने आती है। इसके बाद मुख्य किरदार को ऐसे समाज का सामना करना पड़ता है, जो उसकी पहचान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। कहानी इसी संघर्ष के जरिए प्रेम, सम्मान, अपनापन और गरिमा जैसे बुनियादी मानवीय अधिकारों पर सवाल उठाती है।

फिल्म की खास बात यह है कि इसमें ट्रांसजेंडर पहचान को केवल समाज की बाहरी नजर से नहीं दिखाया गया है। कहानी को मुख्य किरदार के अनुभवों, भावनाओं और मानसिक संघर्ष के करीब ले जाकर प्रस्तुत किया गया है। इस वजह से दर्शक किरदार को केवल एक ‘विषय’ के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसके संघर्ष को महसूस करने लगते हैं।

आशीष शर्माने भी पहले फिल्म के बारे में बातचीत में कहा है कि उन्हें इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद व्यक्तिगत और अंतरंग नजरिया लगा—ऐसी कहानी जो ट्रांसजेंडर समुदाय को बाहर से देखने के बजाय किरदार के अनुभव के भीतर ले जाती है।

फिल्म में मुख्य भूमिका आशीष शर्मा ने निभाई है। सिया के राम,रंगरसिया, चंद्रगुप्त मौर्य और अन्य लोकप्रिय परियोजनाओं में अपनी पहचान बना चुके आशीष ने ‘खेजड़ी’ में बिल्कुल अलग और चुनौतीपूर्ण किरदार को पर्दे पर उतारा है।

इस भूमिका के लिए उनके शारीरिक और मानसिक रूपांतरण की भी काफी चर्चा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने किरदार में पूरी तरह उतरने के लिए अपना वजन लगभग 20 किलो तक कम किया था और भूमिका की मानसिकता को समझने के लिए गहन तैयारी की थी।

फिल्म की अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली। उन्हें NYC South Asian Film Festival 2019 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला था। फिल्म ने राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी कई पुरस्कार हासिल किए थे।

स्क्रीनिंग में मौजूद अभिनेता विनीत कुमार ने आशीष शर्मा के अभिनय की सराहना करते हुए कहा कि ‘खेजड़ी’ जैसी फिल्में उन कहानियों और आवाजों को सामने लाती हैं, जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर नजरअंदाज कर देता है।

उन्होंने कहा कि Aashiesh का प्रदर्शन यह याद दिलाता है कि एक अभिनेता का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज में उन किरदारों और कहानियों को आवाज देना भी है, जिन्हें पर्दे पर पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

स्टेज के सह-संस्थापक एवं सीईओ विनय सिंघल ने कहा कि ‘खेजड़ी’ दर्शकों के सामने ऐसा सवाल रखती है, जिससे बचना आसान नहीं है। फिल्म देखने के बाद ऑडिटोरियम में छाई खामोशी को उन्होंने कहानी की ताकत से जोड़ते हुए कहा कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों में ऐसी कई शक्तिशाली कहानियां मौजूद हैं, जिन्हें मुख्यधारा के मनोरंजन में पर्याप्त स्थान नहीं मिला है।

उन्होंने कहा कि भारत की असली विविधता उसकी अलग-अलग भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और लोगों की कहानियों में दिखाई देती है। ऐसे में क्षेत्रीय सिनेमा को केवल ‘क्षेत्रीय’ दायरे तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने की जरूरत है।

स्टेज की सह-संस्थापक परवीन सिंघल ने कहा कि ‘खेजड़ी’ केवल हाशिये पर मौजूद समुदाय की कहानी नहीं है, बल्कि यह मुख्यधारा के समाज से अपनी सोच और गरिमा की परिभाषा को व्यापक करने की मांग करती है।

‘खेजड़ी’ का सफर केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। फिल्म विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी है और इसे 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाए जाने की जानकारी सामने आई है। फिल्म की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल सर्किट से हुई थी और बाद में इसे स्टेज प्लेटफॉर्म पर भी दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया गया।

फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर कशिश मुंबई International Queer Film Festival में हुआ था। इसके बाद फिल्म ने अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

‘खेजड़ी’ को स्टेज की उन प्रस्तुतियों की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जिनमें मनोरंजन के साथ सामाजिक मुद्दों को भी प्रमुखता दी जाती है।

स्टेज इससे पहले ‘सांवरी’, ‘नाते’ और ‘सांकळ’ जैसी कहानियों को भी मंच दे चुका है। इन फिल्मों में महिलाओं, ट्रांसजेंडर समुदाय, बाल विवाह, जबरन परंपराओं और सामाजिक दबाव जैसे विषयों को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।

स्टेज का कहना है कि उसका उद्देश्य भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद ऐसी कहानियों को सामने लाना है, जिन्हें मुख्यधारा के मनोरंजन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता।

‘खेजड़ी’ की दिल्ली स्क्रीनिंग ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा कि सिनेमा की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित है या वह समाज में बदलाव की चर्चा को भी जन्म दे सकता है।

फिल्म की कहानी दर्शकों को यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि किसी इंसान की पहचान उसके सम्मान से बड़ी कैसे हो सकती है? सामाजिक पूर्वाग्रह किसी व्यक्ति को अपनी पहचान छिपाने के लिए क्यों मजबूर करते हैं? और क्या समाज हर व्यक्ति को उसकी पहचान से परे एक इंसान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार है?

इन्हीं सवालों के कारण ‘खेजड़ी’ एक फिल्म से आगे बढ़कर सामाजिक संवाद का माध्यम बनती दिखाई देती है। स्क्रीनिंग के बाद ऑडिटोरियम में मौजूद दर्शकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया ने भी इसकी पुष्टि की।

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