दीवारों में दरारें, जगह-जगह निकली ईंटें, रोशनी और वजूखाने की उचित व्यवस्था नहीं; जायरीनों की परेशानियों के बीच विधायक, पार्षद और इंतजामिया की भूमिका पर उठे सवाल
नई दिल्ली। पुरानी दिल्ली के अजमेरी गेट स्थित ऐतिहासिक एंग्लो अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल का परिसर अपनी सदियों पुरानी शैक्षणिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए जाना जाता है। हाल ही में स्कूल के मैदान की साफ-सफाई और सुधार के बाद परिसर का एक हिस्सा बेहतर नजर आने लगा है, लेकिन इसी परिसर में मौजूद सूफी संत हजरत हाफिज सादुल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह की जर्जर हालत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक तरफ मैदान को व्यवस्थित और साफ-सुथरा बनाने की पहल दिखाई देती है, वहीं दूसरी तरफ दरगाह की दीवारों में पड़ी दरारें, जगह-जगह से निकली ईंटें और बुनियादी सुविधाओं की कमी इसके संरक्षण की जरूरत को उजागर करती हैं। सवाल यह है कि जब ऐतिहासिक परिसर के दूसरे हिस्सों की साफ-सफाई और सुधार पर ध्यान दिया जा सकता है, तो सूफी संत की इस दरगाह की मरम्मत और रखरखाव के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे?

स्थानीय स्तर पर सामने आई शिकायतों के मुताबिक, हजरत हाफिज सादुल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह की हालत चिंताजनक बताई जा रही है। दरगाह की कई दीवारों पर दरारें हैं और कुछ स्थानों पर ईंटें बाहर निकली हुई दिखाई देती हैं। ऐसे में ऐतिहासिक संरचना की सुरक्षा और भविष्य में होने वाले संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई जा रही है।दरगाह में रोशनी की समुचित व्यवस्था नहीं होने, वजूखाने की सुविधा के अभाव और दरगाह से संबंधित आवश्यक सामान रखने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था नहीं होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
दरगाह पर आने वाले जायरीनों के लिए ये सुविधाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व वाले स्थान पर बुनियादी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए हैं?
दरगाह की मौजूदा स्थिति को देखते हुए संबंधित जिम्मेदारों को न केवल साफ-सफाई, बल्कि संरचना की मजबूती, बिजली और रोशनी सहित जरूरी सुविधाओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
दरगाह से जुड़ी एक अन्य शिकायत इसके प्रवेश द्वार पर तैनात चौकीदार की कार्यप्रणाली को लेकर भी सामने आई है। आरोप है कि दरगाह पर आने वाले कुछ जायरीनों को अंदर जाने से रोका जाता है, जिससे उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है।
हालांकि, प्रवेश व्यवस्था से संबंधित नियमों और प्रतिबंधों की आधिकारिक जानकारी सामने आना जरूरी है। संबंधित इंतजामिया को स्पष्ट करना चाहिए कि जायरीनों के प्रवेश के लिए क्या नियम निर्धारित हैं और यदि किसी प्रकार की पाबंदी है, तो उसका आधार क्या है।
धार्मिक स्थलों पर व्यवस्था और सुरक्षा जरूरी हैं, लेकिन उनके साथ जायरीनों की सुविधा और सम्मान का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है। इस मामले में प्रबंधन की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

न दरारों को किसी ने देखा, न दीवारों का दर्द जाना,
सबने मैदान सँवारा, दरगाह को किसने पहचाना?
यहाँ एक वली-ए-कामिल की यादें आज भी आबाद हैं,
मगर उनकी चौखट के हालात खुद एक सवाल हैं।
मैदान की रौनक पर सबने वाह-वाह कर दिया,
दरगाह की टूटी दीवारों ने मगर सबको खामोश कर दिया।
ऐ जिम्मेदारों! कभी इस तरफ भी ध्यान दो,
इस विरासत को मिटने से पहले कुछ सम्मान दो।
न रोशनी मुकम्मल, न जायरीनों को सहूलतें नसीब,
ऐ मेरे शहर के रहनुमाओं, क्या यही है हमारी तहज़ीब?
अजमेरी गेट के पास स्थित एंग्लो अरेबिक स्कूल का इतिहास मुगलकाल से जुड़ा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1692 में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में प्रभावशाली सिपहसालार मीर शहाबुद्दीन, जिन्हें गाजीउद्दीन खान फिरोज जंग के नाम से भी जाना जाता था, ने यहां मदरसा गाजीउद्दीन खान की स्थापना कराई थी।
इसी परिसर में लाल बलुआ पत्थर से एक खूबसूरत मस्जिद का निर्माण भी कराया गया। वर्ष 1710 में गाजीउद्दीन खान के निधन के बाद उनके पार्थिव अवशेषों को उनकी इच्छा के अनुसार दिल्ली लाकर इसी परिसर में दफनाए जाने का उल्लेख मिलता है। यहां स्थित मकबरा अपनी स्थापत्य शैली और पत्थरों की नक्काशीदार जालियों के लिए जाना जाता है।
वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान इस परिसर को नुकसान पहुंचा और इसकी ऐतिहासिक लाइब्रेरी भी प्रभावित हुई। बाद के वर्षों में यहां एंग्लो अरेबिक कॉलेज के रूप में शैक्षणिक गतिविधियां दोबारा शुरू हुईं। इस प्रकार यह परिसर दिल्ली की शिक्षा, इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
इस परिसर में स्थित हजरत हाफिज सादुल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह का आध्यात्मिक महत्व भी बताया जाता है। सूफी परंपरा से जुड़े विवरणों के अनुसार, हजरत हाफिज सादुल्लाह नक्शबंदी का संबंध नक्शबंदी सिलसिले से था और उन्हें हजरत मिर्जा मजहर जाने-जानां शहीद रहमतुल्लाह अलैह के प्रमुख उस्तादों में गिना जाता है।
यही वजह है कि यह दरगाह केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि सूफी परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान भी है।
दरगाह से जुड़े लोगों और इसकी मौजूदा स्थिति पर चिंता जताने वालों का कहना है कि जिस स्थान पर एक बुजुर्ग सूफी संत आराम फरमा रहे हैं, उसकी देखभाल और संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखना केवल किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि समाज और संबंधित जिम्मेदारों की साझा जिम्मेदारी है।
दरगाह की मौजूदा स्थिति को लेकर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और संबंधित प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्र के विधायक आले मोहम्मद इकबाल और पार्षद राफिया माहिरा से अपील की जा रही है कि वे इस मामले का संज्ञान लें और दरगाह की स्थिति का निरीक्षण कराने के लिए आवश्यक पहल करें।
इसके साथ ही जामिया के जिम्मेदारों और दरगाह की देखरेख करने वाली इंतजामिया से भी जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है। आखिर इस ऐतिहासिक स्थल की देखभाल की जिम्मेदारी किस संस्था या विभाग के पास है? दरगाह की मरम्मत और रखरखाव के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं? यदि सुविधाओं की कमी लंबे समय से बनी हुई है, तो उन्हें दूर करने की योजना क्या है?
इन सवालों का जवाब संबंधित प्रबंधन और अधिकारियों की ओर से दिया जाना चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके और संरक्षण की दिशा में ठोस कार्रवाई हो।

मैदान का विकास स्वागतयोग्य, लेकिन दरगाह की अनदेखी क्यों?
स्कूल के मैदान की साफ-सफाई और सुधार निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम हैं। लेकिन किसी ऐतिहासिक परिसर का विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसके भीतर मौजूद सभी महत्वपूर्ण धरोहरों की सुरक्षा और देखभाल पर भी ध्यान दिया जाए।
दरगाह की दीवारों में दरारें और अन्य कमियां केवल रखरखाव का मामला नहीं हैं। यदि समय रहते तकनीकी निरीक्षण और आवश्यक मरम्मत नहीं कराई गई, तो ऐतिहासिक संरचना को और नुकसान पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
ऐसे में संबंधित अधिकारियों को दरगाह की इमारत का तकनीकी निरीक्षण कराना चाहिए। जरूरत के अनुसार मरम्मत, रोशनी, वजूखाने और आवश्यक सामान रखने के लिए उचित स्थान की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, जायरीनों के प्रवेश से संबंधित शिकायतों की जांच कर स्पष्ट और उचित व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

अब सवाल यह है कि पुरानी दिल्ली की इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत की सुध आखिर कौन लेगा? क्या संबंधित जनप्रतिनिधि, इंतजामिया और जिम्मेदार अधिकारी दरगाह की मौजूदा स्थिति पर ध्यान देकर इसके संरक्षण के लिए ठोस पहल करेंगे, या यह ऐतिहासिक धरोहर इसी तरह उपेक्षा का सामना करती रहेगी?
हजरत हाफिज सादुल्लाह नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह का संरक्षण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का भी सवाल है।


